कदम-कदम पर हावी हैं बनावटी उसूल, सच बनाम कागज के फूल

— दिनेश ठाकुर
अमरीकी लेखक मार्क ट्वैन का काफी चला हुआ कौल है- ‘सच जब तक जूते पहन रहा होता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का चक्कर काट चुका होता है।’ इसके आगे का किस्सा यूं है कि जूते पहन कर सच बाहर निकला तो लोग उसे खरी-खोटी सुनाने लगे- ‘जूते पहनना क्या जरूरी था? अब क्या फायदा, झूठ जाने लोगों के कानों में क्या-क्या फूंक चुका होगा।’ दोराहे पर खड़ा सच सोच में पड़ गया- ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं, या जाऊं ही नहीं।’ उसने कार्यक्रम कैंसिल किया और घर लौट गया। इधर वह जूते खोल रहा था, उधर झूठ बाकी दुनिया का भी चक्कर काट चुका था। वसीम बरेलवी ने फरमाया है- ‘झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गए/ और मैं था कि सच बोलता रह गया।’

राजेश खन्ना की ‘दुश्मन’ में सुना था- ‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से/ कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से।’ लेकिन जमाना सच से ज्यादा कागज के फूलों पर फिदा है। अब देखिए, सारी दुनिया जानती है कि कोरोना काल में आइपीएल के मैच दर्शकों से खाली मैदान में हो रहे हैं, लेकिन टीवी पर मैच के लाइव प्रसारण के दौरान उसी तरह रह-रह कर दर्शकों का रेकॉर्डेड शोर सुनाया जा रहा है, जिस तरह कॉमेडी शो में रेकॉर्डेड हंसी सुना कर बताया जाता है कि इस जगह हंसना है। सिनेमा हो या टीवी, बनावटी माहौल रचने में दोनों माहिर हैं। दोनों ऐसी-ऐसी धुप्पल दिखाते हैं कि सच के होश उड़ जाते हैं। अजीब दौर है। उम्मीद फाजली का शेर है- ‘आसमानों से फरिश्ते जो उतारे जाएं/ वो भी इस दौर में सच बोलें तो मारे जाएं।’

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दो साल पहले आई जॉन अब्राहम की ‘सत्यमेव जयते’ के बारे में दावा किया गया था कि यह झूठ पर सच की जीत की फिल्म है (हर दूसरी फिल्म में यही होता है)। शायद इस फिल्म में कोई कसर रह गई थी, इसलिए इसका दूसरा भाग ‘सत्यमेव जयते 2’ बनाया जा रहा है। याद आता है कि अस्सी के दशक में जब विनोद खन्ना को अमिताभ बच्चन की टक्कर का सितारा माना जा रहा था, वे अचानक गायब हो गए। पता चला कि सच की खोज उन्हें रजनीश की पनाह में ले गई। पांच साल बाद वे फिल्मों में लौट आए। उनके दूसरे दौर की शुरुआती फिल्मों में से एक का नाम भी ‘सत्यमेव जयते’ था। इसमें एक गाने ‘दिल में हो तुम, आंखों में तुम’ की धुन बहुत अच्छी थी।

कुछ साल पहले टीवी पर आमिर खान के टॉक शो ‘सत्यमेव जयते’ ने आंखें खोलने वाली सच्चाइयां जमाने के सामने रखी थीं। सच कभी-कभी नीम से भी कड़वा होता है। कई लोगों को हजम नहीं होता। लिहाजा कुछ हफ्तों बाद इस शो का पर्दा गिर गया। घोर काल्पनिक दुनिया में सैर कराने वाली मसाला फिल्मों के दीवानों को पर्दे पर खुरदरी हकीकत रास नहीं आती। अमिताभ बच्चन की ‘मैं आजाद हूं’ इसीलिए नहीं चली कि इसमें उन्होंने किसी को एक मुक्का तक नहीं मारा। दर्शकों पर आनंद तभी छलछलाता है, जब नायक हैंडपंप उखाड़ कर अपने दुश्मनों को खदेड़ दे (गदर एक प्रेमकथा) या लैम्प पोस्ट उखाड़ कर बदमाश के पीछे दौड़े (सिंघम)। जब तक दर्शक ऐसे बनावटी सीन पर फिदा रहेंगे, सच फिल्मों से दूर-दूर रहेगा। कमाल अहमद ने खूब कहा है- ‘कुछ लोग जो खामोश हैं, ये सोच रहे हैं/ सच बोलेंगे, जब सच के जरा दाम बढ़ेगे।’

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